मनुष्य का रुधिर (Human Blood): उत्पत्ति एवं संरचना
रुधिर की स्थिति (Position)
Chordates में और Nonchordates में से ऐनेलिडा में रुधिर लाल, जल से कुछ भारी (घनत्व -1.04 से 1.07), चिपचिपा-सा (viscosity जल से लगभग 5 गुणा अधिक), स्वाद में नमकीन-सा, कुछ क्षारीय (alkaline-pH 7.3 to 7.5) और अपारदर्शी (opaque) होता है। यह रुधिरवाहिनियों एवं हृदय में होकर पूर्ण शरीर में निरन्तर परिक्रमा करता रहता है। इसीलिए, पूरे शरीर में मोटी और महीन रुधिरवाहिनियों का घना जाल फैला होता है।
हृदय रुधिर को एक प्रकार की रुधिरवाहिनियों में पम्प करता रहता है और दूसरे प्रकार की रुधिरवाहिनियाँ इस रुधिर को वापस हृदय में लाती रहती हैं। मानव शरीर में रुधिर की मात्रा शरीर के भार का लगभग 7 से 8% होती है। अतः एक 70 किलोग्राम के मानव शरीर में औसतन 5 से 6 लीटर रुधिर होता है। यह शरीर का 1/13 वाँ भाग घेरे रहता है। स्त्रियों में रुधिर की मात्रा लगभग 20 से 25% कम (लगभग 4 से 5 लीटर) होती है।
रुधिर की उत्पत्ति एवं संरचना (Origin and Structure)
रुधिर की उत्पत्ति भ्रूण की मीसोडर्म से होती है। अतः मूलतः यह एक तरल संयोजी ऊतक (fluid connective tissue) होता है। इसके अग्रलिखित चार विशिष्ट लक्षण होते हैं-
(1) इसमें बाह्यकोशिकीय पदार्थ (matrix) प्लाज्मा (plasma) नामक तरल होता है।
(2) प्लाज्मा में कई प्रकार की अनेक कोशिकाएँ होती हैं और एक विशेष प्रकार की कोशिकाओं के अनेक छोटे-छोटे टुकड़े (cell fragments) होते हैं। इन सबको रुधिराणु (blood corpuscles) कहते हैं।
(3) प्लाज्मा में तन्तु (fibres) बिल्कुल नहीं होते हैं
(4) प्लाज्मा का स्रावण रुधिराणु नहीं करते हैं
रुधिर तथा इसके उत्पादक ऊतकों और इनकी अनियमितताओं के अध्ययन की शाखा को रुधिर विज्ञान या हीमैटोलोजी (Hematology) कहते हैं।
रुधिर का प्लाज्मा या प्लाविका (Plasma of Blood)
यह रुधिर का, हल्के पीले रंग का और हल्का-सा क्षारीय, साफ, पारदर्शक एवं निर्जीव आन्तरकोशिकीय मैट्रिक्स या आधारभूत तरल (intercellular matrix or ground fluid) होता है। यह रुधिर का लगभग 55% भाग (शरीर के भार का 5% अर्थात् 70 kg मनुष्य में लगभग 3.5 लीटर) बनाता है। इसमें लगभग 91% जल होता है। शेष 9% भाग में कई प्रकार के अकार्बनिक और कार्बनिक पदार्थ होते हैं। इस प्रकार, प्लाज्मा पदार्थों का एक जटिल मिश्रण होता है। इसके अकार्बनिक पदार्थों में सोडियम क्लोराइड और सोडियम बाइकार्बोनेट लवण प्रमुख तथा कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं पोटेशियम आदि के फॉस्फेट, सल्फेट, बाइकार्बनिट तथा आयोडाइड आदि लवण सूक्ष्म मात्रा में होते हैं। सब लवण मिलकर प्लाज्मा का लगभग 0.9% भाग बनाते हैं। ये आयनों (ions) के रूप में होते हैं। इन्हीं के कारण रुधिर हल्का क्षारीय होता है। तन्त्रिकाओं, पेशियों तथा अन्य ऊतकों की सुचारु कार्यिकी के लिए रुधिर में इन लवणों के आयनों का उचित मात्रा में उपस्थित रहना बहुत आवश्यक होता है।
प्लाज्मा में कुछ ऐसे कार्बनिक पदार्थ होते हैं जो कुछ तो इसके घटक (constituents) होते हैं और कुछ वे होते हैं जिनका यह संवहन करता है। ये सब निम्नलिखित होते हैं-
1. प्लाज्मा प्रोटीन्स (Plasma Proteins): प्लाज्मा में इनकी मात्रा 7 से 8% (लगभग 300 ग्राम) होती है। इनमें ऐल्यूमिन्स (albumins), ग्लोब्यूलिन्स (globulins), प्रोथ्रॉम्बिन (prothrombin) तथा फाइब्रिनोजन (fibrinogen) प्रमुख होती हैं। ये यकृत में बनकर रुधिर में मुक्त होती हैं, परन्तु ग्लोब्यूलिन्स प्लाज्मा कोशिकाओं द्वारा लिम्फॉइड अंगों में भी बनती हैं। सारी रुधिर प्रोटीन्स गोलाकार (globular) एवं घुलनशील होती हैं। ये प्लाज्मा के जल में कोलॉएड्स (colloids) के रूप में रहती है। अतः ये प्लाज्मा को जल से लगभग 4-5 गुणा गाढ़ा बनाए रखती हैं और इसकी परासरणी दाब (osmotic pressure) का नियन्त्रण करती हैं। प्रोथ्रॉम्बिन एवं फाइब्रिनोजन प्लाज्मा प्रोटीन्स का 4% अंश बनाती हैं और रुधिर के स्कंदन (clotting) में भाग लेती हैं। ऐल्बूमिन सबसे छोटी, परन्तु सबसे अधिक (प्लाज्मा प्रोटीन्स की लगभग 55%) प्लाज्मा प्रोटीन्स होती हैं। ये परासरणी दाब को बनाए रखती हैं, ऊतक द्रव्य एवं कोशिकाओं में जल का नियन्त्रण करती हैं तथा कई पदार्थों (कैल्सियम, कुछ हॉरमोनों और कुछ औषधियों आदि) के संवहन में सहायता करती है। ग्लोब्यूलिन्स परासरणी दाब को बनाए रखने तथा पदाथों के संवहन में सहायता करती हैं। कुछ ग्लोब्यूलिन्स प्रतिरक्षी (immunoglobulins) होती हैं। इन्हें गामा ग्लोब्यूलिन्स (gamma globulins) कहते हैं। ये संक्रमण रोगों से शरीर की सुरक्षा करने का काम करती हैं। अतः इन्हें प्रतिरक्षी (antibody) प्रोटीन्स भी कहते हैं। कुछ उत्प्रेरक प्रोटीन्स अर्थात् एन्जाइम्स (enzymes) भी प्लाज्मा में होते है।
2. पचे हुए पोषक पदार्थ: इनमें ग्लूकोस, वसा, वसीय अम्ल, ग्लिसरॉल, न्यूक्लिओसाइड्स, ऐमीनो अम्ल, विटामिन्स, फॉस्फोलिपिड्स, कोलेस्ट्रॉल आदि होते हैं जिन्हें शरीर की सारी कोशिकाएँ आवश्यकतानुसार रुधिर से लेती रहती हैं।
3. उत्सर्जी पदार्थ: इनमें शरीर की समस्त कोशिकाओं द्वारा विसर्जित की गई अमोनिया तथा मुख्यतः यकृत कोशिकाओं द्वारा विसर्जित किए गए यूरिया, यूरिक अम्ल, क्रिटीन, क्रिटिनीन आदि होते हैं जिन्हें रुधिर से kidney ग्रहण करती रहती हैं। वृक्कों की कार्यिकी में अनियमितता के कारण रुधिर में यूरिया की मात्रा अत्यधिक बढ़ सकती है। इस दशा को यूरीमिया (uremia) कहते हैं।
4. हॉरमोन्स (Hormones): ये अन्तःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा ऊतक द्रव्य में स्रावित होकर सीधे रुधिर में पहुँचते हैं और रुधिर के माध्यम से सारे शरीर में संचरित होते हैं। शरीर की कोशिकाएँ फिर इन्हें रुधिर से ग्रहण करती हैं।
5. घुली गैसें : प्लाज्मा में प्रति 100 मिली जल में लगभग 0.29 मिली ऑक्सीजन (O2), 0.5 मिली नाइट्रोजन (N2) तथा 0.5 मिली कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैसें घुली रहती हैं।
6. सुरक्षात्मक पदार्थ (Defensive Compounds): प्लाज्मा की कुछ ग्लोब्यूलिन प्रोटीन्स इम्यूनोग्लोब्यूलिन्स या प्रतिरक्षी पदार्थ (immunoglobulins or antibodies) कहलाती हैं। ये तथा कुछ अन्य पदार्थ, जैसे कि लाइसोजाइम (lysozyme-एक पोलीसैकेराइड), प्रोपरडिन (properdin) प्रोटीन आदि, उन जीवाणुओं (bacteria), विषाणुओं (viruses) तथा हानिकारक पदार्थों को नष्ट करते हैं जो किसी प्रकार शरीर के अन्तःवातावरण में पहुँच जाते हैं।
7. प्रतिजामन (Anticoagulant) : संयोजी ऊतकों की मास्ट कोशिकाएँ रुधिर के प्लाज्मा में निरन्तर हिपैरिन (heparin) नामक संयुक्त पोलीसैकेराइड (conjugated polysaccharide) मुक्त करती रहती हैं। हिपैरिन रुधिर-वाहिनियों में बहते हुए रुधिर को जमने से रोकता है।
प्लाज्मा में उपरोक्त पदार्थों की मात्राएँ रुधिर और कोशिकाओं के बीच रासायनिक आदान-प्रदान के कारण कुछ सीमा तक अल्प समय के लिए बदलती रहती हैं।
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