हृदय का विशिष्ट संचालक ऊतक (Specialized Conducting Tissue of Heart)
हृदय का नियमित लयबद्ध स्पंदन तथा प्रत्येक स्पंदन की उत्पत्ति एवं इसका नियन्त्रण वैज्ञानिक समस्याएँ बनी रहीं हैं। सबसे पहले हॉलर (Haller) ने व्यक्त किया कि जब हृदय के किसी कक्ष में रुधिर भरकर इसकी दीवार के सम्पर्क में आता है तभी कक्ष में आकुंचन (Contraction) होता है। यह मत गलत सिद्ध हुआ, क्योंकि खाली हृदय में भी नियमित स्पंदन होता रहता है।
इसके बाद, heartbeat के सूत्रपात (Inception) को तन्त्रिकीय आवेगों (nerve impulses) द्वारा प्रेरित, अर्थात् तन्त्रिजनक (neurogenic) क्रिया माना गया। यह मत भी गलत सिद्ध हुआ, क्योंकि हृदय से सम्बन्धित तन्त्रिकाओं को काट देने पर भी हृद्-स्पंदन (heartbeat) जैसा होता था वैसा ही होता रहता है बिना किसी बदलाव के।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि हृद्-स्पंदन (heartbeat) की शुरुआत स्वयं हृदय की दीवार में उपस्थित कुछ विशेष प्रकार के पेशी तन्तुओं में ही होता है, अर्थात् यह पेशीजनक (myogenic) क्रिया होती है। इन तन्तुओं में आकुंचन की क्षमता (contractility) नहीं होती, बल्कि स्वः उत्तेजन (self-excitation) द्वारा चालक प्रेरणाएँ (motor impulses) उत्पन्न करके इन्हें हृदय की पेशियों में आकुंचन की प्रेरणाओं के रूप में प्रसारित करने की क्षमता होती है। अतः हृदय की दीवार के पेशी स्तर में इन विशिष्ट प्रकार के तन्तुओं का जाल फैला होता है जिसे शिरा-निलयी तन्त्र (sinuatrial system) कहते हैं। इसीलिए, कार्यिकी के सन्दर्भ में, हृदय को शरीर का स्वायत्त अंग (autonomous organ) माना जाता है। यद्यपि तन्त्रिकीय (neuronal) तथा हॉरमोनी (hormonal) प्रेरणाएँ भी हृदय में पहुँचती हैं, परन्तु हृद्-स्पंदन के सूत्रपात से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता है; ये केवल हृद्-स्पंदन की दर को प्रभावित करती हैं।
शिरा-निलयी तन्त्र के घटक (Components of Sinoatrial System)
शिरा-निलयी तन्त्र (Sinoatrial System) में विशिष्टिकृत तन्तुओं के दो सघन घुण्डीनुमा पिण्ड (nodes) होते हैं तथा इन पिण्डों से हृदय की पूर्ण दीवार में फैले प्रेरणा-प्रसारण तन्तु (impulse-conducting fibres) होते हैं। इस पूरे तन्त्र को निम्नलिखित पाँच घटकों में बाँटा जाता है-
1. शिरा-अलिन्दीय घुण्डी (Sinuatrial node-SA node): यह स्वः उत्तेजक (Self-stimulating) तन्तुओं का एक छोटा, अर्धचन्द्राकार-सा घना पिण्ड होता है जो दाएँ अलिन्द (Right atrium) की दीवार में उच्च महाशिरा (superior vena cava) के छिद्र के पास स्थित होता है। इसके तन्तुओं को गुण्ठीय तन्तु (nodal fibres) कहते हैं। इन तन्तुओं में किसी बाहरी उद्यीपन के बिना ही एक मिनट में 70 से 80 बार स्वः उत्तेजन से लयबद्ध (rhythmic) हृद्-स्पंदन की प्रेरणाओं का जीवनभर, बिना थके, सूत्रपात होता रहता है। इसीलिए, SA घुण्डी को हृदय का स्पंदन केन्द्र या गति-निर्धारक (contraction centre or pacemaker) कहते हैं। इससे अनेक प्रेरणा-संचारी तन्तु निकलकर दाएँ एवं बाएँ अलिन्दों की हृद्पेशियों में आकुंचन की प्रेरणाओं (contraction impulses) का प्रसारण करते हैं।
2. अलिन्द-निलयी घुण्डी (Atrioventricular node-AV node): यह प्रेरणा-प्रसारण तन्तुओं का, SA node में कुछ छोटा सघन पिण्ड होता है जो आन्तरअलिन्दीय पट्ट (interatrial septum) के निचले भाग में दाएँ अलिन्द की ओर कोरोनरी साइनस (coronary sinus) के छिद्र के निकट स्थित होता है। SA घुण्डी से निकले कुछ प्रेरणा-संचारी तन्तु AV घुण्डी में जाते हैं, अर्थात् ये प्रेरणा-प्रसारण (impulse-conduction) का एक आन्तरघुण्डीय परिपथ (internodal pathway) स्थापित करते हैं। AV node से वे प्रेरणा-प्रसारण तन्तु निकलते हैं जो निलयों में आकुंचन की प्रेरणाएँ दे जाते हैं।
3. अलिन्द-निलयी गुच्छा अर्थात् हिस का गुच्छक (Atrioventricular Bundle or Bundle of HIS): यह प्रेरणा-प्रसारण तन्तुओं का एक छोटा व मोटा गुच्छा होता है जो AV घुण्डी से निकलकर "हृदयी कंकाल" के सघन संयोजी ऊतक को भेदता हुआ आन्तरनिलयी पट्ट (interventricular septum) के ऊपरी भाग में पहुँचता है।
4. दाईं व बाईं गुच्छक शाखाएँ (Right and Left Bundle Branches): आन्तरनिलयी पट्ट में पहुँचकर Bundle of HIS दो शाखाओं में बँट जाता है। एक शाखा पट्ट के दाएँ भाग में तथा दूसरी पट्ट के बाएँ भाग में होती हुई पट्ट के निचले भाग में पहुँचती हैं। इसीलिए, इन शाखाओं को दाईं व बाईं गुच्छक शाखाएँ कहते हैं।
5. परकिन्जे तन्तु (Purkinje Fibres): आन्तरनिलयी पट्ट में होकर गुजरते समय तथा पट्ट के निचले भाग में पहुँचकर दाईं व बाईं गुच्छक शाखाओं के तन्तु अपनी-अपनी ओर के निलय की दीवार में फैल जाते हैं और विभाजित हो-होकर निलयों के पेशी तन्तुओं में आकुंचन की प्रेरणाएँ (contraction impulses) पहुँचाते हैं। इन्हीं सब तन्तुओं को परकिन्जे तन्तु कहते हैं।
कृत्रिम गति-निर्धारक (Artificial Pacemaker)
यदि किसी कारणवश शिराअलिन्दीय घुण्डी (Sinuatrial node-SA node) ठीक से काम नहीं कर पाती है, या हृदय के विशिष्ट संचालक ऊतक में तंत्रिकीय आवेगों का प्रसारण ठीक से नहीं होता है तो एक कृत्रिम गति-निर्धारक (Artificial Pacemaker) को वक्ष भाग में हँसली की हड्डी (collar bone) के पास या उदर भाग में त्वचा के नीचे फिट करके एक विद्युत् तार द्वारा हृदय से जोड़ देते हैं। यह Pacemaker छोटा-सा, बैटरी द्वारा संचालित, विद्युत् उपकरण होता है जो नियमित या आवश्यक समयान्तरों पर तन्त्रिकीय आवेगों का प्रसारण करता रहता है।
विद्युत् हृद्लेखन (Electrocardiography)
हृदय के शिरा-निलयी तन्त्र (Sinoatrial System) के पेशी तन्तुओं में Cardiac muscles के आकुंचनों की प्रेरणाओं के संचारण के लिए इतनी विद्युत् उत्पन्न होती है कि इलेक्ट्रोड्स (electrodes) तथा एक विद्युत्-संवेदी उपकरण की सहायता से इन विद्युती प्रेरणाओं को नापा जा सकता है। इस प्रकार heartbeat के हृदयी चक्रों का एक ग्राफ (graph) के रूप में अभिलेखन (recording) किया जा सकता है। इसीलिए, इस प्रक्रिया में उपयोजित उपकरण को विद्युत् हृद्लेखी (electrocardiograph) तथा इस उपकरण द्वारा अभिलेखित ग्राफ को विद्युत् हृद्लेख (electro-cardio-gram-ECG) कहते हैं। इसी विधि द्वारा डॉक्टर heartbeat की अनियमितताओं का पता लगाते हैं।
विद्युत् हृद्लेखी (electrocardiograph) एक तरंगित अर्थात् लहरदार (wavy) graph के रूप में होता है जिसमें एक सीधी रेखा से तीन स्थानों पर लहरें उठी दिखाई देती हैं-P लहर (P wave), QRS सम्मिश्र (QRS complex) तथा T लहर (T wave)। P लहर ऊपर की ओर उठी हुई एक छोटी-सी लहर होती है जो 0.1 सेकण्ड के अलिन्दीय संकुचन (atrial systole) की सूचक होती है।
इसके समाप्त होने के 0.1 सेकण्ड बाद QRS सम्मिश्र की लहरें प्रारम्भ होती हैं। ये एक-दूसरी से जुड़ी तीन सँकरी, परन्तु नुकीली लहरें क्रमशः होती हैं-नीचे की ओर उठी छोटी सी Q लहर, इससे ऊपर की ओर उठी बड़ी R लहर तथा इससे जुड़ी नीचे की ओर उठी छोटी-सी S लहर। यह सम्मिश्र 0.3 सेकण्ड के निलयी संकुचन के प्रारम्भ का सूचक होता है। फिर निलयी संकुचन की अन्तिम प्रावस्था और इनके क्रमिक प्रसारण के प्रारम्भ की सूचक के रूप में T लहर होती है।
हृद्-स्पंदन का तन्त्रिकीय नियन्त्रण (Neural Control)
हालाँकि Cardiac cycles का सामान्य स्थाई दर से सूत्रपात SA घुण्डी द्वारा ही होता है, लेकिन स्पंदन दर (Pulse rate), शरीर की आवश्यकतानुसार, स्वायत्त (autonomic) तन्त्रिकीय नियन्त्रण द्वारा, घटाई बढ़ाई जा सकती है। Pulse rate को घटाने की प्रेरणा को हृदय में ले जाने वाले तन्तु परानुकम्पी (parasympathetic) होते हैं।
ये वेगस कैनियल तन्त्रिकाओं में होते हैं। दाईं वेगस के तन्तु मुख्यतः SA घुण्डी को तथा बाईं के मुख्यतः AV घुण्डी को प्रभावित करके स्पंदन दर घटाते हैं। घुण्डियों को इस प्रकार प्रभावित करने के लिए इन तन्त्रिका तन्तुओं के हृदयी छोरों पर ऐसेटिल्कोलीन (acetylcholine) नामक पदार्थ का स्रावण होता है।
स्पंदन दर को बढ़ाने वाले तन्त्रिका तन्तु अनुकम्पी (sympathetic) होते हैं। ये स्पाइनल तन्त्रिकाओं में होते हैं। ये SA तथा AV घुण्डियों के बजाय हृदय की दीवार में फैले होते हैं और नोरएड्रीनेलीन (noradrenaline) नामक न्यूरोहॉरमोन (neurohormone) का स्रावण करके Pulse rate को बढ़ाते हैं।
हृदमंदता (Bradycardia) तथा हृत्प्रवेग (Tachycardia)
सामान्यतः वृद्धावस्था में heart beat rate घटकर लगभग 60 प्रति मिनट हो जाती है। इसे हृदमंदता (bradycardia) कहते हैं। इसके विपरीत व्यायाम, घबराहट, चिन्ता, तनाव, ज्वर आदि के समय heart beat rate बढ़कर लगभग 100 या इससे भी अधिक हो जाती है। इसे हृत्प्रवेग (tachycardia) कहते हैं।
हृदय-पात (Heart Failure)
यदि हृदय की रुधिर-सप्लाई में थोड़ा-सा भी अवरोध होता है तो हृद्-पेशियों को उचित ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं होती है जिससे हमें छाती में दर्द का आभास होने लगता है। इसे हृद्शूल (angina pectoris) कहते हैं। हृद्शूल के कारण, या शरीर में समस्थैतिकता के बिगड़ जाने, या हृदय पर तन्तुपट के अत्यधिक दबाव, या विषैली औषधियों के प्रभाव, या बिजली का करेन्ट लग जाने आदि से हृद्-स्पंदन असामान्य हो जाता है। स्पंदन की लय का सामंजस्य बिगड़ जाता है और इसकी दर अत्यधिक तीव्र हो जाती है।
यह गड़बड़ी इसलिए होती है कि हृद्-स्पंदन का सूत्रपात शिरा-अलिन्द घुण्डी से होने के बजाय निलयी पेशियों से होने लगता है। इस दशा को ऐरिथ्मिया (arrhythmia) कहते हैं। इस दशा में निलय के पेशीहृद्रस्तर (ventricular myocardium) का संयोजी ऊतक गलने लगता (रोधगलन - infarction) है और इसमें कोलेजन तन्तु बनने लगते हैं। इसके फलस्वरूप हृद्-स्पंदन बंद (cardiac arrest) हो जाता है, अर्थात् हृदय-पात (heart failure) के कारण रोगी की मृत्यु हो जाती है।
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