मनुष्य का हृदय (Human Heart): स्थिति, आकृति, माप एवं भार (Position, Shape, Size and Weight of Heart)
हृदय की स्थिति, आकृति, माप एवं भार (Position, Shape, Size and Weight of Heart)
मनुष्य का हृदय गुलाबी से रंग का शंक्वाकार (conical), खोखला एवं स्पंदनशील (pulsatile), मांसल अंग होता है जो वक्ष भाग (chest area) के मध्यावकाश (mediastinal space) में फेफड़ों के बीच तथा डायफ्राम (diaphragm) के ठीक ऊपर, आगे की ओर स्थित रहता है।
यह हमारी बन्द मुट्ठी के बराबर, लगभग 12 सेर्म लम्बा, सबसे चौड़े भाग में 9 सेमी चौड़ा तथा 6 सेमी मोटा होता है। वयस्क व्यक्ति में इसका भार औसतन 300 ग्राम होत है। इसका लगभग दो-तिहाई भाग शरीर की मध्य रेखा के बाईं ओर होता है। इसके चौड़े भाग को आधार भाग (base) कहते हैं।
यह ऊपर की ओर तथा दाईं ओर होता है और पीठ अर्थात् हमारे पृष्ठतल की ओर झुका रहता है। नीचे की ओर वाला शंक्वाकार-सा भाग एक कुन्द छोर में समाप्त होता है जिसे शिखर (apex) कहते हैं। यह बाईं ओर होता है और सामने की, अर्थात् हमारे अधरतल की, ओर झुका रहता है। इस प्रकार, हृदय तिरछा स्थित होता है।
हृदय की संरचना एवं कार्यिकी के अध्ययन की शाखा को हृदय विज्ञान (Cardiology) कहते हैं।
हृदयावरण (Pericardium)
हमारा हृदय महीन दीवार की बनी एक बन्द थैली द्वारा घिरा होता है जिसे हृदयावरणी थैली (pericardial sac) या केवल हृदयावरण (pericardium) कहते हैं। इस थैली की महीन दीवार चपटी, शल्की कोशिकाओं (squamous cells) की अकेली उपकला (epithelium) होती है जिसे मीसोथीलियम (mesothelium) कहते हैं। यह पारदर्शी (transparent) होती है। इसे सीरमी हृदयावरण (serous pericardium) भी कहते हैं।
हृदय की सतह पर फैले भीतर की ओर वाले सीरमी Pericardium को आन्तरांगीय हृदयावरण (visceral pericardium) कहते हैं। इसके विपरीत, देहभित्ति की ओर के बाहरी सीरमी Pericardium को भित्तीय हृदयावरण (parietal pericardium) कहते हैं। इस पर तन्तुकीय संयोजी ऊतक का बना एक दृढ़ आवरण होता है जिसे तन्तुकीय हृदयावरण (fibrous pericardium) कहते हैं।
यह आवरण नीचे की ओर diaphragm से तथा ऊपर की ओर हृदय से जुड़ी मोटी रुधिरवाहिनियों के छोरों पर ढके संयोजी ऊतक से जुड़ा रहता है। अतः यह हृदय को यथास्थान बाँधे रखने का काम करता है। साथ ही यह हृदय को आवश्यकता से अधिक फैल जाने से भी रोकता है।
भित्तीय तथा आन्तरांगीय सीरमी हृदयावरणों (endocardial serous membranes) के बीच में हृदयावरणी थैली की महीन हृदयावरणी गुहा (pericardial cavity) होती है। इसमें सीरमी हृदयावरण की मीसोथीलियमी कोशिकाओं द्वारा स्रावित एक चिपचिपे एवं पारदर्शक हृदयावरणी तरल (pericardial fluid) की केवल इतनी-सी मात्रा होती है जो भित्तीय एवं आन्तरांगीय सीरमी हृदयावरणों को परस्पर चिपकाए रखती है।
अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक फेफड़े (lung) के चारों ओर की फुफ्फुसावरणी गुहा (pleural cavity) की भाँति, हृदयावरणी गुहा भी मात्र एक सम्भाव्य अन्तराल (potential space) के रूप में होती है।
हृदयावरणी थैली के कई महत्वपूर्ण कार्य होते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है -
(1) हृदय को नम बनाए रखती है
(2) बाहरी धक्कों एवं चोटों से हृदय की सुरक्षा करती है
(3) इसे स्पंदन में होने वाले घर्षण के दुष्प्रभाव से बचाती है
(4) स्पंदन में इसे फैलने की सुविधा देती है, परन्तु आवश्यकता से अधिक फैलने से रोकती है।
हृदय के बाह्य लक्षण (External Features of Heart)
हृदय रुधिर परिसंचरण तन्त्र का केन्द्रीय अंग होता है, अर्थात् रुधिरवाहिनियाँ इसी से रुधिर को पूरे शरीर में ले जाती हैं और इसी में वापस लाती हैं। एक स्पष्ट हृद्-खाँच (coronary sulcus) हृदय के ऊपरी चौड़े भाग को पिछले शंक्वाकार भाग से पृथक् करती है।
हृदय का ऊपरी चौड़ा भाग लम्बाई में काफी छोटा होता है। इसे अलिन्द (atrium) कहते हैं। इसका निचला, शंक्वाकार भाग अधिक लम्बा और अधिक मांसल होता है। इसे निलय (ventricle) कहते हैं।
एक खड़ी आन्तरअलिन्दीय खाँच (interatrial sulcus) अलिन्द को बड़े दाएँ अलिन्द (right atrium) तथा छोटे बाएँ अलिन्द (left atrium) में विभेदित करती है, परन्तु यह खाँच स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। इसी प्रकार, एक खड़ी आन्तरनिलयी खाँच (interventri-cular sulcus) निलय को भी दाएँ-बाएँ निलयों में विभेदित करती है। यह खाँच अधिक स्पष्ट होती है। यह हृदय की मध्य रेखा में न होकर इस प्रकार तिरछी होती है कि बायाँ निलय, सँकरा परन्तु लम्बा होता है तथा दायाँ निलय चौड़ा, परन्तु लम्बाई में कुछ छोटा होता है।
प्रत्येक अलिन्द में कुत्ते के कान की आकृति का एक ऐसा अलिन्दीय उपांग (auricuíar append-age) होता है जो रुधिर से भरने पर अलिन्द से ऊपर की ओर बाहर निकला दिखाई देने लगता है।
हृदय की सतह पर की खाँचों में हृदय से सम्बन्धित प्रमुख रुधिरवाहिनियाँ होती हैं। इनके ऊपर वसीय ऊतक आच्छादित रहता है। अतः इस ऊतक को हटाने पर ही ये खाँचें दिखाई देती हैं।
हृदय सभी मनुष्यों में परिसंचरण का मूलभूत अंग होता है। इस लेख में जानें कि कृत्रिम हृदय (Artificial Heart) का आविष्कार कब और कैसे हुआ।
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