पौधों में जल का परिवहन कैसे होता है? (Transport of Water in Plants)
पौधों की जड़े मिट्टी से जल का अवशोषण करती हैं। यह जल जड़ से तने तथा शाखाओं में होता हुआ पत्तियों तक पहुँचता है जहाँ से जल का अधिकतर भाग वाष्प के रूप में वायुमण्डल में पहुँच जाता है। परन्तु कुछ भाग प्रकाश-संश्लेषण तथा दूसरी दैहिकीय क्रियाओं में प्रयुक्त हो जाता है। इस प्रकार मिट्टी से अवशोषित जल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पर्याप्त ऊँचाई तक पहुँचता है। कभी-कभी यह ऊँचाई 366 फीट (सिकोइया सेमपरवीरेन्स-Sequoia sempervirens) तक होती है। इस प्रकार से गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल के ऊपर की ओर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण (ascent of sap) कहते हैं।
पौधों में रसारोहण का अध्ययन दो भागों में किया जाता है-
I. रसारोहण-मार्ग (Path of ascent of sap)
II. रसारोहण क्रिया-विधि (Mechanism of ascent of sap)
I. रसारोहण-मार्ग (Path of Ascent of Sap)
नीचे हमने कुछ प्रयोग दिखाए हैं जिसके द्वारा यह सिद्ध हो जाता है कि पौधों में जल जाइलम बाहिनियों (xylem tracheids) तथा जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) द्वारा ऊपर चढ़ता है।
प्रयोग 1 - एक बीकर में इयोसिन (eosin) का जलीय विलयन लिया जिसका रंग लाल होता है। बालसम (Balsam) के पौधे के तने को जल में काटकर इयोसिन विलयन में रख दिया। कुछ घण्टे बाद तने पर लाल रंग की धारियों दिखलायी देती हैं और पत्ती की शिराएँ (veins) भी लाल रंग की हो जाती हैं। विभिन्न स्थानों से तने की अनुप्रस्थ काट को देखने से पता चलता है कि केवल जाइलम वाहिनियाँ (tracheids) तथा वाहिकाएँ (vessels) ही रंगीन होती हैं जिससे सिद्ध होता है कि रसारोहण वाहिनियों तथा वाहिकाओं द्वारा होता है।
प्रयोग 2- वलयकरण का प्रयोग (Ringing experiment) - किसी पौधे की पत्तियों युक्त शाखा को जल में काटकर उसे जल से भरे बीकर में रख देते हैं। लगभग एक इंच चौड़ा एक गोल वलय (ring) बनाते हुए दारु (xylem) से बाहर की सब ऊतियों वल्कुट (cortex), पोषवाह (phloem) तथा एधा (cambium) को हटा दिया जाता है। कटे सिरे की ओर का मध्यक (pith) भी नष्ट कर दिया जाता है। बहुत समय तक शाखा को नलिका में रखने पर भी पत्तियाँ नहीं मुरझाती हैं। इससे सिद्ध होता है कि जल जाइलम वाहिनियों द्वारा ऊपर चढ़ता है।
प्रयोग 3 - पौधों की एक शाखा को जल में काटकर, कटे भाग को पिघले मोम में रखने के बाद ठण्डा करके मोम जमा लेते हैं। फिर मोम लगे भागों को एक चाकू से इस प्रकार काटते हैं कि जाइलम वाहिनियों की अवकाशिका या गुहा (lumen) में मोम भरा रहे परन्तु कटे भाग की भित्तियों पर मोम न रहे। इस प्रकार तैयार की गयी शाखा को जल से भरे बीकर में रख देते हैं तो कुछ समय पश्चात् पत्तियाँ मुरझा जाती हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि रसारोहण, दारु वाहिनियों की अवकाशिका या गुहा (lumen) द्वारा होता है।
II. रसारोहण क्रिया-विधि (Mechanism of Ascent of Sap)
रसारोहण की क्रिया-विधि को लेकर दो विभिन्न प्रकार की विचारधाराएँ रखी गयी हैं। एक विचारधारा जैव शक्ति वाद (vital force theory) है जिसके अनुसार यह एक दैहिकीय क्रिया है। अतः जिस प्रकार अन्य दैहिकीय क्रियाएँ जीवित कोशाओं से सम्बन्धित हैं, उसी प्रकार रसारोहण भी जीवित कोशाओं से सम्बन्धित है तथा दूसरी भौतिक शक्ति वाद (physical force theory) है जिसके अनुसार रसारोहण भौतिक क्रिया है तथा उसमें जीवित कोशाओं का कोई कार्य नहीं है।
जैव शक्ति वाद (Vital Force Theories)
रसारोहण के सम्बन्ध में जैव शक्ति वाद में विश्वास करने वाला प्रथम व्यक्ति वेस्टरमीयर (Westermeir, 1883-84) था। उसका विचार था कि पौधों के तनों में जल काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) की जीवित कोशाओं में होने वाली क्रियाओं के कारण ऊपर चढ़ता है तथा जाइलम वाहिनियों और वाहिकाएँ केवल जलाशय का काम करती हैं। गॉड्लेवस्की (Godlewski, 1884) के अनुसार काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) तथा मध्यक किरणों (medullary rays) की जीवित कोशाओं का परासरण दाब आवर्ती रूप से बदलता रहता है, जिसके कारण इन कोशाओं में एक पम्पन क्रिया (pumping activity) होती है जिसके फलस्वरूप जल का रसारोहण होता है। परन्तु इस मत की प्रयोगात्मक पुष्टि नहीं की गयी।
सन् 1923 में भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चन्द्र बोस ने एक इलेक्ट्रिक प्रोब (electric probe) के द्वारा प्रयोग किये। उन्होंने यन्त्र की सूई को पौधे के तने में धीरे-धीरे अन्दर की ओर ले जाने पर देखा कि जिस समय सूई की नोक endodermis (वत्कुट की सबसे अन्दर बाली परत) में घुसती है तो गैल्वेनोमीटर की सुई प्रबल दोलन दिखलाती है। इस प्रकार के दोलन वल्कुट (cortex) की परत के अन्दर और बाहर की कोशिकाओं में सूई प्रवेश कराने पर दिखलायी नहीं देते हैं।
बोस ने इस परिणाम से यह निष्कर्ष निकाला कि इन कोशाओं की स्पंदन क्रिया (pulsatory movement) के कारण ही जल का रसारोहण होता है और केवल जाइलम कोशाओं में रसारोहण होता है। [शक्ति वल्कुट (force cortex) की अन्दर की परत से प्राप्त होती है।]
सर जे०सी० बोस के निष्कर्ष से पूर्व ही स्ट्रासबर्गर (Strasburger 1891) ने अपने प्रयोग में पौधे के ऊपर का भाग काटकर कटे सिरे को पिकरिक अम्ल से भरे बर्तन में रखा तथा बाद में इसी तने को इयोसिन विलयन में रखा तो देखा कि इयोसिन पत्तियों में पहुँचता है। पिकरिक अम्ल (picric acid) में जीवित कोशाओं की मृत्यु हो जाने पर भी इयोसिन पत्तियों में ऊपर चढ़ गया जिससे सिद्ध होता है कि जैव शक्ति वाद की धारणा निराधार है।
भौतिक शक्ति वाद (Physical Force Theories)
(1) अन्तःचूषण वाद (Imbibition theory) - इस मत के अनुसार पौधों में रसारोहण की क्रिया जाइलम अवयवों (xylem elements) की मोटी भित्ति द्वारा जल के अन्तःचूषण के कारण होती है। इस मत को उंगर (Unger 1968) ने दिया तथा सेच्स (Saches 1978) ने इसे समर्थन दिया। यह मत इसलिए अमान्य है क्योंकि प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि तने में जल जाइलम अवयवों की गुहाओं (lumens) से होकर चढ़ता है, न कि उनकी भित्तियों द्वारा।
(2) मूल-दाब मत (Root pressure theory)- इस मत के अनुसार, रसारोहण की क्रिया मूल-दाब के कारण होती है, परन्तु यह देखा गया है कि यदि पौधों की जड़े काट दी जायें फिर भी जल ऊपर की ओर चढ़ता है। इसके अतिरिक्त मूल-दाब सामान्यतः +1 से +2 बार (bars) तक होता है जिससे केवल 20 मीटर की ऊँचाई तक ही रसारोहण सम्भव है। शुष्क मृदा अथवा इसमें वायु की कमी की दशा में मूल-दाब उत्पन्न नहीं हो पाता। इस प्रकार यह मत भी मान्य नहीं है।
(3) केशिका बल मत (Capillary force theory)- यह मत क्रिश्चियन वोल्फ (Christian Wolf 1873) ने दिया। इस मत के अनुसार, जाइलम की संकरी वाहिकाएँ (vessels) केशनली की तरह कार्य करती हैं और उनमें उत्पन्न पृष्ठ तनाव (surface tension) के कारण रसारोहण क्रिया होती है। यह मत भी मान्य नहीं है, क्योंकि मृदीय जल सीधे जाइलम वाहिकाओं के सम्पर्क में नहीं रहता। इसके अतिरिक्त नग्नबीजी पौधों में वाहिकाएँ अनुपस्थित होती हैं इनमें केवल वाहिनिकाएँ (tracheids) पायी जाती हैं जिनमें अंत्य भित्ति (end wall) के कारण केशिका बल विकसित नहीं हो सकता है।
(4) वाष्पोत्सर्जनाकर्षण - जलीय संसंजक मत (Transpirational pull-cohesive force of water theory) - इस वाद को 1894 ई० में डिक्सन (Dixon) तथा जोली (Jolly) नाम के वैज्ञानिकों ने प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर ऊँचे-से-ऊँचे पौधों में रसारोहण सम्बन्धी शंका का समाधान किया गया। इस समय अधिकतर वैज्ञानिकों को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण- जलीय संसंजक मत (transpirational pull-cohesive force of water theory) मान्य है। यह वाद निम्नलिखित मुख्य बातों पर आधारित है-
(i) वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpirational pull) - पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशाओं (mesophyll cells) की भित्तियों से जल का वाष्पन होता है तो उन कोशाओं की परासरण-सान्द्रता तथा उनमें जल की विसरण-दाब-न्यूनता (DPD) अधिक हो जाती है जिसके कारण जल जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) से खिंचकर परासरण द्वारा पर्णमध्योतक कोशाओं की जल की कमी को पूरा करने के लिए प्रवेश करता है। इस घटना से जाइलम के द्रव पर एक तनाव (tension) उत्पन्न हो जाता है। क्योंकि यह तनाव वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होता है अतः इसे वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpirational pull) कहा जाता है।
(ii) जल का संसंजक बल (Cohesive force of water) - हाइड्रोजन बन्धों (hydrogen bonds) के कारण जल के अणु एक-दूसरे की ओर खिंचे रहते हैं, अर्थात् जल के अणुओं के बीच परस्पर आकर्षण (mutual attraction) होता है। जल के अणुओं के इस गुण को संसंजक बल (cohesive force) कहते हैं। संसंजक बल के कारण मूलरोम से पत्तियों तक जल की धारा टूट नहीं पाती, अर्थात् जल का एक अविरल स्तम्भ (continuous column) बना रहता है। जल का यह बल विशेष रूप से उस समय प्रदर्शित होता है जिस समय जल को लम्बी नलिकाओं में रखते हैं।
(iii) जल तथा जाइलम की भित्ति के बीच आसंजन (Adhesion between water and wall of the xylem) - जल के अणु संकीर्ण जाइलम वाहिकाओं तथा वाहिनिकाओं से आसंजक बल (adhesive force) द्वारा जुड़े रहते हैं। असमान अणुओं के बीच इस आकर्षण को आसंजन (adhesion) कहते हैं। यह आसंजन पूर्ण जल स्तम्भ (water column) को रोकने तथा सहारा देने के लिये पर्याप्त है।
पत्तियों में हो रहे वाष्पोत्सर्जन के कारण एक तनाव (tension) वाहिकाओं में रहने वाले जल पर पड़ता है जो जल को ऊपर की ओर खींचता है, क्योंकि जल के अणुओं में संसंजक बल होता है इसलिये जल एक अखण्ड स्तम्भ (continuous column) के रूप में पौधों की चोटी तक आरोहण करता है। वास्तव में जल के अणुओं के बीच संसंजक बल (cohesive force) तथा जल के अणुओं व जाइलम वाहिकाओं की भित्ति के बीच आसंजक बल (adhesive force) ही पूरे जल स्तम्भ को ऊपर की ओर खींचने के लिए उत्तरदायी हैं।
इस व्यवस्था में जाइलम की वाहिकाएँ एवं वाहिनियाँ केवल एक निष्क्रिय नली के रूप में कार्य करती हैं और उनमें होकर जल ऊपर चढ़ता है। पत्तियों द्वारा वाष्पोत्सर्जन में नष्ट हुए जल की पूर्ति हेतु अधिक-से-अधिक जल निरन्तर मृदा से जड़ में जाता रहता है।
वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpirational pull) का प्रदर्शन - किसी पौधे की एक टहनी को कुछ पत्तियों सहित काटकर एक इंच व्यास की जल से भरी नली के ऊपरी सिरे पर कॉर्क के छेद में फिट कर दिया जाता है। नली के नीचे के भाग को पारे से भरे बीकर में डुबो दिया जाता है। सभी जोड़ को air-tight कर लिया जाता है। इस यन्त्र को कुछ समय धूप में रखने पर हम देखते हैं कि नली में पारा ऊपर चढ़ जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि रसारोहण वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpirational pull) के कारण होता है।
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