पौधों में शर्कराओं का स्थानान्तरण (Translocation of Sugars in Plants)| in Hindi


पौधों में शर्कराओं का स्थानान्तरण (Translocation of Sugars in Plants) 

पौधों में शर्कराओं का स्थानान्तरण (Translocation of Sugars in Plants)

पौधे के प्रत्येक भाग को अपने पोषण और विकास के लिये निरन्तर खाद्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। कुछ पौधों की प्रत्येक कोशिका में खाद्य-पदार्थों का निर्माण करने की क्षमता होती है, जैसे यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) [स्थापनांग (holdfast) में आरम्भ में पर्णहरिम होता है जो बाद में नष्ट हो जाता है]। परन्तु उच्च वर्ग के पौधों के प्रत्येक भाग में अपने खाद्य-पदार्थों के निर्माण की क्षमता नहीं होती, जैसे जड़ें, पुराने तने (रूपान्तरित तने जैसे कन्द, प्रकन्द)। इन वर्गों के पौधों की पत्तियों तथा तरुण तने ही भोजन निर्माण कर सकते हैं। 

यदि पौधों को जीवित रहना है तो पत्तियों द्वारा निर्मित खाद्य-पदार्थ जड़ों तक पहुँचने आवश्यक हैं। भोजन के अभाव में जड़ों की वृद्धि और विकास नहीं होगा और न ही उनमें ऊर्जा उत्पन्न होगी जो कि जल एवं लवणों के अवशोषण के लिये आवश्यक है। इसलिये खाद्य-पदार्थों का ऐसे स्थानों से जहाँ उनका निर्माण होता है (या वे संचित रहते हैं, जैसे आलू का कन्द), या दूसरे भागों में जहाँ उनका निर्माण नहीं होता है स्थानान्तरण आवश्यक है। कार्बनिक खाद्य-पदार्थों के जलीय घोल में, पौधे के एक भाग से दूसरे भाग में आने-जाने को खाद्य-पदार्थों का स्थानान्तरण (translocation) कहा जाता है। 

खाद्य-पदार्थों का स्थानान्तरण वास्तव में ऊर्जा अपेक्षित क्रिया (energy requiring process) है जिसमें प्रकाश-संश्लेषण के उत्पाद मुख्यतः सुक्रोस के रूप में ही पूरे पादप शरीर में स्थानान्तरित होते हैं। विभिन्न कोशिकाओं में पहुँचकर यह श्वसन में प्रयुक्त होने के लिये पुनः ग्लूकोस में बदल जाता है अथवा स्टार्च आदि में बदलकर संचित हो जाता है। जिन स्थानों पर भोज्य-पदार्थों का निर्माण होता है उन्हें स्रोत (source) कहते हैं तथा जिन भागों में ये आवश्यकतानुसार जाते हैं उन्हें अभिगम (sink) कहते हैं। 

खाद्य-पदार्थों के स्थानान्तरण का अध्ययन निम्न भागों में किया जाता है- 

(1) स्थानान्तरण की दिशा (Direction of translocation). 

(2) स्थानान्तरण का पथ (Path of translocation). 

(3) स्थानान्तरण की यान्त्रिक क्रिया-प्रणाली (Mechanism of translocation) 


(1) स्थानान्तरण की दिशा (Direction of Translocation) 

पौधों में खाद्य-पदाथों का स्थानान्तरण कई दिशाओं में हो सकता है- नीचे की ओर, ऊपर की ओर, पार्श्व दिशा में; पिथ (pith) से वत्कुट (cortex) की ओर आदि। 

हरी पत्तियों द्वारा निर्मित भोजन नीचे तने व जड़ों की ओर जाता है। इनका कुछ भाग नवीन शाखाओं के निर्माण में तथा कुछ भाग पुरानी कोशिकाओं को पोषित करने के उपयोग में लाया जाता है। कुछ विशेष प्रकार की जड़ों (गाजर, मूली) व तनों (आलू का कन्द, अदरक का प्रकन्द) में भोजन अघुलित खाद्य-पदार्थों के रूप में संचय कर लिया जाता है। 

बीज के अंकुरण के समय, भूमिगत् संचायक भागों से नये तनों व पत्तियों के निर्माण के समय, फलों की वृद्धि और विकास के समय और उन कलिकाओं में जिनकी वृद्धि बीते शरद् काल में रुक गयी थी बसन्त आते ही फिर से वृद्धि होने लगती है, खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण ऊपर की ओर होने लगता है। 

इस प्रकार पौधों में खाद्य-पदार्थों का स्थानान्तरण सदा अधिक सान्द्रता वाले भागों से कम सान्द्रता वाले भागों की ओर होता है। अधिक सान्द्रता वाले भागों को सम्भरण सिरे (supply end) और कम सान्द्रता वाले भागों को उपभोग सिरे (consumption end) कहते हैं। कार्बनिक विलयनों के सम्भरण सिरे, हरी पत्तियों तथा संचायक अंग (storage organs) हैं और उपभोग सिरे वृद्धि करने वाले वे भाग हैं जहाँ खाद्य पदार्थों के स्थानान्तरण से ऊर्जा के उत्पादन के लिये इनका ऑक्सीकरण (oxidation) होता है। 



(2) स्थानान्तरण का पथ (Path of Translocation) 

(A) कार्बनिक पदार्थों का नीचे की ओर स्थानान्तरण (Down-ward conduction of organic solutes)

फ्लोएम में उपस्थित कार्बनिक विलेयों में 90% सुक्रोस तथा शेष में अमीनों अम्ल, अकार्बनिक फॉस्फेट्स तथा नाइट्रेट्स होते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि कार्बनिक पदार्थों का नीचे की ओर स्थानान्तरण फ्लोएम (phloem) के द्वारा होता है। यह धारणा निम्नलिखित प्रयोगों पर आधारित है- 

(i) अन्य ऊतकों का विलोपन (Elimination of other tissues)- जाइलम (xylem) और फ्लोएम (phloem) की कोशिकाएँ खाद्य-पदार्थों के, पौधों की लम्बाई की दिशा में स्थानान्तरण के लिये विशेष रूप से उपयुक्त हैं। जाइलम (xylem) में लवणों का जलीय घोल भरा रहता है जो जड़ से ऊपर पत्तियों की ओर चलता है। फ्लोएम की चालनी नलिकाओं (sieve tubes) के सिरे एक-दूसरे से मिलकर लम्बी नलिकाएँ बना लेते हैं। जो एक-दूसरे से अत्यन्त छोटे छिद्रों वाली प्लेट (sieve plate) से जुड़ी रहती हैं। अतः ये नलिकाएँ खाद्य-पदार्थों के नीचे की ओर स्थानान्तरण के लिए विशेष रूप से उपयुक्त होती हैं। 
स्थानान्तरण का पथ (Path of Translocation) - स्थानांतरण क्रिया का प्रदर्शन दिखाते हुए लेबलयुक्त चित्र



(ii) फ्लोएम रस का रासायनिक विश्लेषण (Chemical analysis of phloem sap) - फ्लोएम में कार्बनिक खाद्य पदार्थों का घोल अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। दिन में प्रकाश संश्लेषण के कारण पत्तियों में शर्करा अधिक मात्रा में होती है। कुछ समय पश्चात् फ्लोएम में भी शर्करा की मात्रा अधिक हो जाती है। इस प्रकार रात्रि में प्रकाश संश्लेषण की अनुपस्थिति के कारण पत्ती में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है और इसी प्रकार से फ्लोएम में भी शर्करा की मात्रा कम हो जाती है।


iii) फ्लोएम की संरचना एवं वितरण (Structure and distribution of phloem) - कुकुरबिटेसी (Cucurbitaceae) कुल के पौधों की पत्तियाँ बड़ी होती हैं, परन्तु तना पतला होता है। तने में उभयफ्लोएमी (bicollateral) संवहन बण्डल पाये जाते हैं (जाइलम के दोनों ओर फ्लोएम पाया जाता है) जिनसे बड़ी पत्ती द्वारा बनाये खाद्य-पदार्थ ठीक प्रकार से पौधे के दूसरे भागों में पहुँच सकें। 

(iv) वलयकरण प्रयोग (Ringing = girdling experiment) - किसी पौधे के तने में (पत्तियों के नीचे) एक स्थान पर जाइलम को छोड़कर चारों ओर के सभी बाहरी ऊतकों (फ्लोएम सहित) को एक चाकू से काटकर अलग कर देते हैं। कुछ समय पश्चात् वलय के ऊपर का भाग खाद्य-पदार्थों के एकत्र होने के कारण फूल जाता है और नीचे के भाग में खाद्य-पदार्थों का ह्रास हो जाता है (चित्र में देखें) क्योंकि नीचे के भाग में उसका उपयोग कर लिया जाता है और वलय के कारण नीचे की ओर भोजन न पहुँचने से इस भाग की वृद्धि रुक जाती है तथा नयी जड़ों का निकलना बन्द हो जाता है और धीरे-धीरे उनकी मृत्यु हो जाती है। 

वलयकरण प्रयोग दिखाते हुए लेबलयुक्त चित्र

कभी-कभी फलों के विकास के समय एक वृक्ष की कुछ शाखाओं में फलों व पत्तियों के नीचे वलय बना देने से पत्तियों में बना भोजन तने के निचले भाग में न जाकर फलों में चला जाता है और फल आकार में बड़े हो जाते हैं। 


(B) खाद्य-पदार्थों का ऊपर की ओर स्थानान्तरण (Upward conduction of organic solutes) - 

डिक्सन (Dixon) के अनुसार खाद्य-पदार्थों का ऊपर की ओर स्थानान्तरण जाइलम (xylem) के द्वारा होता है। परन्तु अब इस विचार से वैज्ञानिक अधिक सहमत नहीं हैं। कर्टिस (Curtis) के अनुसार यह कार्य भी फ्लोएम के द्वारा होता है। 

उसका यह मत वलयकरण प्रयोगों के ऊपर आधारित है। उन्होंने तीन शिशु काष्ठीय पौधे लिये। 
'अ' पौधे में जाइलम (xylem) के बाहर के सभी ऊतकों को वलयकरण (ringing) द्वारा अलग कर दिया। 'ब' पौधे में जाइलम (xylem) का सभी भाग अलग कर दिया गया परन्तु फ्लोएम, आदि को अलग नहीं किया गया। 'स' पौधे में फ्लोएम और जाइलम दोनों ही सामान्य अवस्था में रखे गये। 

पौधे 'अ' और 'ब' में फ्लोएम व जाइलम के अलग करने के स्थान के ऊपर तने से सभी पत्तियाँ हटा दी गयी। 'अ' पौधे में वलयकरण के ऊपर के भाग में वृद्धि 'ब' प्रयोग वाले पौधे से कम हुई और साथ ही 'अ' पौधे में शुष्क भार और शर्करा की मात्रा वलयकरण के ऊपर के भाग में सबसे कम पायी गयी। 

'अ' पौधे का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि खाद्य-पदार्थों का ऊपर की ओर स्थानान्तरण फ्लोएम (phloem) के द्वारा होता है। 



(3) स्थानान्तरण की यान्त्रिक क्रिया प्रणाली (Mechanism of Translocation) 


स्थानान्तरण की क्रिया प्रणाली के बारे में तीन मत हैं- 

(i) विसरण परिकल्पना (Diffusion hypothesis) - यह परिकल्पना इस सिद्धान्त पर आधारित है कि पदार्थों के बहाव की दिशा अधिक सान्द्रता वाले विलयनों से कम सान्द्रता वाले विलयनों की ओर होती है। इस प्रकार पत्तियों में निरन्तर बनने वाले खाद्य-पदार्थों के घोल (या संचित भागों में रहने वाले खाद्य-पदार्थ) जड़ तथा दूसरे भागों में विसरण के द्वारा चलते रहते हैं। परन्तु इस विचारधारा को स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि विसरण का वेग फ्लोएम में होने वाले स्थानान्तरण के वेग से कम होता है। 

(ii) जीवद्रव्य-धारा-प्रवाह परिकल्पना (Protoplasmic streaming hypothesis) - इस परिकल्पना के अनुसार जीवद्रव्य कोशिका में ऊपर-नीचे, इधर-उधर चारों ओर धारा-मार्गों के रूप में प्रवाह करता है। इन धाराओं में खाद्य-पदार्थों के अणु या छोटे कण तैरते हुए अथवा आगे बढ़ते हुए स्थानान्तरित होते हैं (चित्र में देखें)। 

जीवद्रव्य-धारा-प्रवाह परिकल्पना दिखाते हुए लेबलयुक्त चित्र

परन्तु इस विचारधारा को भी स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि फ्लोएम में होने वाले स्थानान्तरण का वेग जीवद्रव्य के धारा - मार्गी प्रवाह के कारण उत्पन्न नहीं होता। 


(iii) दाब-जनित प्रवाह (Pressure flow) = मात्रात्मक प्रवाह परिकल्पना (Mass flow hypothesis) = मुन्च की परिकल्पना (Münch's hypothesis)- इस परिकल्पना को मुन्च (Münch) ने 1927-30 में प्रतिपादित किया। यह परिकल्पना निम्नलिखित सिद्धान्तों पर आधारित है (नीचे चित्र में देखें)। A और B दो प्रसरण-तन्त्र (osmometers) एक नली T द्वारा जुड़े हैं। A और B दोनों तन्त्रों को जल से भरे बीकर में रखा और दोनों बीकरों को एक-दूसरी नली t द्वारा जोड़ दिया। दोनों प्रसरण तन्त्रों की झिल्ली केवल जल के लिए पारगम्य है। A तन्त्र में शर्करा का अधिक सान्द्रता वाला विलयन भरा होता है और B तन्त्र में जल भरा है। 

मुन्च की परिकल्पना का प्रयोग दिखाते हुए लेबलयुक्त चित्र

परासरण द्वारा जल A प्रसरण तन्त्र में प्रवेश करके स्फीति दाब (turgor pressure) उत्पन्न करेगा जिससे घोल नली T के द्वारा B प्रसरण तन्त्र में पहुँचेगा। यदि B प्रसरण तन्त्र से किसी प्रकार शर्करा निरन्तर अलग की जाती रहे अथवा व्यय होती रहे तब घोल निरन्तर A तन्त्र से B तन्त्र की ओर चलता रहेगा और B प्रसरण तन्त्र से जल लगातार बाहर की ओर बीकर में आता रहेगा। जहाँ से वह t नली द्वारा A प्रसरण तन्त्र वाले बीकर में आता रहेगा। 

मुन्च के अनुसार ठीक इसी प्रकार की प्रसरण की क्रिया पौधे में फ्लोएम के माध्यम से खाद्य-पदार्थों के नीचे की ओर स्थानान्तरण में होती रहती है। पत्तियाँ 'A' प्रसरण तन्त्र के रूप में, फ्लोएम की कोशिकाएँ नली 'T' के रूप में और जड़ें 'B' प्रसरण तन्त्र के रूप में तथा दोनों बीकरों को जोड़ने वाली नलिका 't' जाइलम के रूप में कार्य करती हैं। 

इस मत के अनुसार पत्तियों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण द्वारा शर्करा उत्पन्न होते रहने से उसमें विलयन की सान्द्रता अधिक रहती है। इसी कारण परासरण दाब (osmotic pressure) भी अधिक रहता है (A तन्त्र से तुलना कीजिये)। पत्तियों की कोशिकाओं से यह विलयन तनों में स्थित फ्लोएम (phloem) की चालनी नलिकाओं (T नलिका से तुलना कीजिये) से होकर जड़ों (B तन्त्र से तुलना कीजिये) तक पहुँच जाता है। 

जड़ों में पहुँचकर विलेय पदार्थ कुछ तो श्वसन-क्रिया के उपयोग में आ जाता है तथा शेष स्टार्च के रूप में संचित हो जाता है। जड़ में शेष रहा जल और अधिक जल के साथ (जो जड़ों द्वारा भूमि से अवशोषित किया गया) जाइलम (t नलिका से तुलना कीजिये) के द्वारा फिर से पत्तियों में ऊपर की ओर चला जाता है। कुछ बातें मुन्च की परिकल्पना के विरोध में हैं, परन्तु फिर भी इस मत को अधिकतर वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार किया जाता है। 












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